Friday, September 15, 2017

Stranger ...


अजनबी ... 

क्या है इस शब्द का मतलब,
इसका वजूद, इसकी हकीकत,
आइये जानते है,
समझते है इसको,
थोड़ा करीब से,
एक कहानी के ज़रिये। 

एक दिन चौराहे पे, किसी से मुलाक़ात हो गयी,
क्या पता, इस मुलाक़ात में ऐसी क्या बात हो गयी,
कि कुछ पहचाने से लगे वो,
अपने तो नहीं, पर बेगाने भी न लगे वो। 

कुछ दिन बीते, रातें बीती, बात कुछ और हुई,
हंसने लगे दोनों साथ, मेरी खामियाँ भी नज़रअंदाज़ हुई,
फिर कुछ ऐसा हुआ, कि क्या कहे अब,
रातों को जागना, दिन में खो जाना,
ये हाल किसको सुनाये अब। 

एक रास्ता लड़के को सूझा,
उसने फ़ोन उठाया और फटाफट नंबर घुमाया,
सोच रहे हो, कि लड़की को किया फ़ोन,
और बोल दी दिल की सारी बात। 
पर यहीं तो दोस्तों, एक बात समझ नहीं आती,
लड़के को था इतना डर,
कि उसकी जुबां ही उसका साथ छोड़ जाती। 

फ़ोन तो घुमाया था और हाल-ए-दिल भी सुनाया था,
पर की जिससे बात, वो लड़की नहीं थी,
थी उसकी दीदी, 
लड़के की दोस्त, जो उसे करीब से भी जानती । 
सोचा की कुछ मदद मिलेगी, थोड़ी हिम्मत बढ़ेगी,
पर इस बार भी उसकी किस्मत कर गयी धोखा। 
आलम ये है अब, महीने हुए बात किये,
न ही लड़की मिली और हाथ से चली गयी दोस्त। 

वो लड़का अब अनजान, 
खुद से खुदको छुपाता घूमता है। 
हंसना, खिलखिलाना भूल,
बस कहानियों में खुदको ढूंढता है। 

ये थी वो अजनबी जो अपनों से भी अपनी तो हुई,
इतनी की ये लड़का ही अब खुद से अनजाना हो गया। 

अगर समझ आयी कहानी,
तो लड़के के लिए दुआ कीजियेगा। 
और अगर नहीं आयी,
तो पढ़ के बस मुस्कुरा दीजियेगा। 

शुक्रिया। 

Tuesday, August 15, 2017

Partition..

A poem on partition of India


विभाजन ..

आइये एक कहानी है सुनाते,
हिंदुस्तान की कहानी, जिसे आज़ादी है गाती। 

एक परिवार था, मत पूछो कहाँ,
प्यारा सा, बेहेन भाइयो, रिश्ते नातो से भरा,
आँगन में जिनके त्यौहार गूंजा करते थे,
बिना भेद भाव के जहां गले लगा करते थे। 

बिखर गया है आज वो, भीड़ में कही खो गया,
लोग तो आगे बढ़ गए, पर वो खँडहर हो गया। 
किसी ने इस कदर, उसकी आबरू को है नोचा,
की आज भी उसके निशाँ, दीखते है जिस्म पर। 

नफरत भरी आँखों में, इस कदर,
की आज भी परिंदे उसे देख, जाते है सिहर,
जो कभी एक दूसरे की, हिम्मत का हिस्सा थे,
वह भाई अब, नए घरो में करते है बसर। 

नाम नए ले लिए, पीढ़ियां भी बदल गयी,
प्रगति की चादर से, पुरानी इमारत भी ढक गयी,
उस खँडहर में अब, न ही किरणे है बची,
जो थोड़ी उम्मीद थी, आंसुओं में बह गयी। 

लकीर जब खींची थी किसीने, इस परिवार के दो टुकड़े हुए,
सोचा की अगर साथ रहे, तो एक दूसरे को ख़तम करेंगे,
पर आज भी इनमे, वही राक्षस बास्ते है,
कोई पीछे मुड़कर देखे, तो बताये, कैसे रिश्ते सजते है। 

क्या हांसिल किया अलग होकर,
आज तक बैठे है दिलो में आग लेकर,
बस पुरानी यादों के सहारे जी रहे है,
एक दूसरे के प्यार को तरस्कर। 

कई बार दोनों ने कोशिशें की,
पर नयी रफ़्तार में जज़्बात नहीं है बास्ते,
यहां मिलती तकनीकियां, मारने की, 
मिटाने की, एक दूसरे को निचा दिखने को तरसते। 

कोई बताये,
क्या मिला एक दूसरे से लड़कर, मार कर,
जिस मिटटी के टुकड़े के लिए थे लड़े,
उसी की छाती को बार बार लाल कर। 

आज 70 सालो बाद भी, लोग रोते है, बिलखते है,
जब भी याद आता आज़ादी का मंज़र, लोग डरते है,
जिस दिन खुशियां आनी थी, उसने ग़म की चादर ओढ़ी,
वो आज भी हमारे सीनो  में, शूल से चुभते है। 

जिस दिन घरो में दीप जले थे,
वो आधी रात को आयी,
दीपक के उजाले में मिली,
तो बस उसके अन्धकार की गहराई। 

3 युद्ध और आर्थिक रूप की है ये महामारी,
जिससे जूझते दोनों, रोटी को तरसते है,
सडको पे, गलियों में, गाओं में,
बच्चे दूध को बिलखते है। 

वह मिटटी, जिसकी आबरू के लिए दी कई कुरबानियां,
उसकी छाती अब सूख रही है, ये है हमारी मेहरबानियां,
जो कभी सोना उगला करती थी, दुनिया को रोशन कर,
अब उसके अपने घर पर, गुमसुम है किलकारियाँ। 

विभाजन करने वाले चले गए,
पर उसके ग़म से जुझती नस्लें,
मरहम की उम्मीद में ज़िंदा है,
सूखी छाती और घाव लिए बदन पे। 

" वह माँ आज भी चौराहे पे,
   उम्मीद लगाए देख रही है। 
   कब दोनों बच्चे लौटेंगे,
   और कब ये खँडहर नाचेगा। 
   कब कड़वी यादों पे,
   मरहम वो लगाएगा। 
   कब फिर से इस आँगन में,
   ईद मानेगी, दीप वो जलाएगा।

   क्या ऐसा भी एक दिन आएगा,
   कब ऐसा भी एक दिन आएगा। "

Saturday, February 18, 2017

You ...

This one is something special for me...


You ...

It was raining like hell, when I saw you for first time,
It wasn't the usual rain, rather was rain of your smile,
I wasn't able to imagine, what it was actually,
I was sweating profusely in the middle of windy night.

It was my eyes that kept searching for you,
It was my ears that kept looking for you,
Why I always wanted to be around, I don't know,
But the feeling that I got, I knew it was you.

They say that love has no shape, then why it looks like you,
They say that love has no voice, then why it heard like you,
I was alone, suffering and evaporating slowly in my world,
Then why now I want to get condensed with you.

I never thought, I will be writing this,
I never thought, I will feel like this,
I know, you will never be mine,
Then why still, it feels content with you.

I know, I would never say this to you,
I know, I would never let you know,
I fear of the neglect that I might receive,
Then why it still says to be with you
and let you know.

Sunday, February 12, 2017

Mohabbat ..

I am posting this now as i thought that it is worth to be posting.. These are my feelings and my expressions in a mix of two beautiful languages.. Hindi and Urdu..

Kindly read and give your feedback..


मोहब्बत ... 

जशन-ए-मोहब्बत को दिल में बसाया,
नफरत-ए-आंधी को लबो पे भी लाया,
ऐ मुक़द्दर के मालिक, 
तेरी मुल्कियत खिदमत में खुद को सजदा कर 
खुद को आशिक़ो के जनाज़े का हिस्सा बनाया। 

जशन-ए-मोहब्बत की रूह को छूकर,
तेरे पास होने के ऐहसास को खोकर,
ऐ मुक़द्दर के मौला,
तुझे अपनी ज़िन्दगी के कारवाँ का बादशाह समझकर
उसको बेवफा समझा और खुद को काफ़िर बनाया। 

जशन-ए-मोहब्बत में रियायत बरती,
तुझे दूसरे के आशियानें में देख ये जां निकलती,
ऐ मुक़द्दर के शहंशाह,
बस इतना बता दे क्या कसूर था मेरा
क्यों इस दिल को आईना और उसे पत्थर का बनाया। 

जशन-ए-मोहब्बत की आज़ादी का नशा है,
अकेलेपन में डूबने की मिली इस दिल को सजा है,
ऐ मुक़द्दर के मसीहा,
बस इतना बता दे क्या पाया इस नन्ही सी जान को सताकर,
क्यों रास्ता दिखा कर हर बार मुझे भटकाया। 

Tuesday, August 16, 2016

Two India...

Hi All, This is my new poem based on the concept of Two India. We all know that India is a secular country. It has many cultures, languages and religions. But, it also has a differentiation based on the people's mentality. There are two India that resides in my country. This poem is a satire on the same concept.



"मेहफिल  ... "

कई है बन्दे जो यहाँ, रहते जो बस घर-घर में है,
देखते है इक नज़र से, सोचते दो मन से है,
गिरगिटों सी है ये फितरत, दीखते जो एक रंग में है,
क्या बताये आज तुमको, बात जो मेहफिल में है।

कई है बन्दे जो यहाँ, कहते है जो करते है वो,
जेबे है इनकी ही खाली, दीखते है आदर्श वो,
सब जगह इनकी ज़रुरत, इनकी न सोचे कोई,
क्या बताये आज तुमको, बात इस मेहफिल में है।

ये थी इक गाथा सुनते, भारत के स्वरूपों की,
भिन्न है जो प्रारम्भ से और आज के आरम्भ में भी,
साथ मिलके वो मनाते है दिवाली ईद भी,
क्या बताये आज तुमको, बात जो घर-घर में है।

पाने को स्वतंत्रता, दी है कई कुर्बानियाँ,
मानते है सब यहाँ, इनकी है ये मेहरबानियाँ,
सींचा है भारत को हमने, सबकी इन उम्मीदों से,
सिखलाती हमको कहानी, आज़ादी के महत्व से।


Wednesday, February 17, 2016

A New Face...

This is the one dedicated to one who came as a flash to me...


चेहरा। ... 

जी करता है दिल की हसरत तुझे बना लूँ
हर एक लम्हे की चाहत तुझे बना लूँ
कह कुछ पाता नहीं यूँ तो तुझसे मैं
पर दिल में अपनी मोह्हबत तुझे बना लूँ।

तुझसे बात करने को जैसे ये दिल तड़प गया था
हर लम्हा देखने को जिसे नज़रे तरस गयी थी
क्या कुछ नहीं किया उनकी एक झलक पाने को
इंतज़ार तेरी आँखों का मेरे दिल में उतर गया था।

किस मूरत से बनाया है उपरवाले ने तुझे
जहाँ देखता हूँ बस देखता हूँ तुझे
ये नशा है किसी चीज़ का या कुछ और
कहाँ एक याद थी नज़रों की तू
और अब कुछ कहने की चाहत है तुझे।

Friday, December 11, 2015

Dawn... The Morning

This one is after quite a long time. I was just lost in the middle of some maze but, thanks to God, I am rescued hail and hearty.

I hope you will like my new poem.....

सवेरा ... 

फिर आज कई दिनों बाद नींद से जागा हूँ ,
फिर खुली है आँख, उठ बिस्तर से भागा हूँ ,
ये नई सुबह का एहसास है या पुरानी यादों की रौशनी ,
फिर अरमानो के झरोखे से बाहर झाका हूँ।

बनाते बनाते ये कभी एहसास ही नहीं हुआ ,
सपनो के महल में कही दूर खो गया ,
आज जागा तो पता चला सच्चाई का ,
फिर इस बार किले को धरती पे बनाना भूल गया।

तक़्दीर बनाने वाले ने भी खूब बनाया है ,
रेत के किलो सी तक़्दीर सबकी बनायीं ,
कभी बनती तो कभी लहरों में मिल जाती है ,
फिर इसी महल को लहरों से दूर बनाना भूल गया।

फिर आज कई दिनों बाद नींद से जागा हूँ ,
सुबह की ठंडी में बाहर निकला ,
सूरज की गर्मी को साँसों में भरे ,
फिर अरमानो के किले बनाने मैं चला।