Tuesday, September 24, 2019

Na Jaane Kyun ...

न जाने क्यों  ... 

न जाने क्यों आज भी मैं, खुद को ढूंढ रहा हूँ,
Mobile और Whatsapp के ज़माने में, कलम खोज रहा हूँ,
जहाँ लोग बस मैं और खुद की दौड़ में भाग रहे है,
यहां अपनी कुर्शी पे बैठा मैं, हम को खोज रहा हूँ। 

न जाने क्यों आज भी मैं, खुद को खोज रहा हूँ,
Make-up और Break-up के ज़माने में, पवित्र मन को खोज रहा हूँ,
प्यार जो बस कुछ लफ़्ज़ों में सिमट कर रह गया है,
न जाने क्यों उसको मैं, लोगों के दिलो में खोज रहा हूँ। 

Freedom के इस दौर में मैं, बंधनो को खोज रहा हूँ,
Individuality के बीच में, संयुक्त परिवार खोज रहा हूँ,
आज के इस दौर में जहाँ लोग Smiley से काम चला लेते है,
न जाने क्यों इसके बीच में, मैं लम्बे Messages खोज रहा हूँ। 

आज की इस तेज़ रफ़्तार ज़िन्दगी में, स्थिरता को खोज रहा हूँ,
रुपये कमाने की भाग दौड़ में, खुशियों को खोज रहा हूँ,
आज जब लोग मिलो दूर के लोगों से Facebook और Whatsapp के ज़रिये जुड़े है,
न जाने क्यों इस बीच में, मैं रिश्तो और पड़ोसियों को खोज रहा हूँ। 

Fashion के नाम पे कुछ भी पेहेन लेने के बीच, सभ्यता को खोज रहा हूँ,
Item Song के ज़माने में, मैं Family Movies खोज रहा हूँ,
आज जहाँ लोग Weekend को Party करने का इंतज़ार करते है,
न जाने क्यों मैं इस बीच, एक साथ बैठा परिवार खोज रहा हूँ। 

Time Pass के इस दौर में मैं, सच्ची प्रेम कहानी को खोज रहा हूँ,
"I don't think its working anymore", कहने वाले लोगों के बीच,
कृष्णा-राधा, लैला-मजनू, शिरीन और फरहाद को खोज रहा हूँ,
21स्वी सदी के इस आधुनिक दौर में मैं, गुज़री हुई सदियों को खोज रहा हूँ। 

न जाने क्यों आज भी मैं, खुद को खोज रहा हूँ। 
न जाने क्यों आज भी मैं, खुद को ढूढ़ रहा हूँ। 

Saturday, August 10, 2019

Neer-aasha

इस शब्द का मतलब है नीर की आशा, जल की आशा।  जल जो जीवन है, जिससे सब कुछ है, हम है, तुम हो, ये जहां है। उसी तरह आशाएं है जिससे हम ज़िंदा है। जिसकी वजह हर सुबह लगती है जो कल न हुआ,  शायद आज होगा। इसी के साथ बस इतना ही कहूंगा की पढ़िए और अपने विचार मुझे ज़रूर बताइये।

नीर-आशा .... 

मंज़िलें तो सबको मिली, राहें भी सबकी थी,
बस हम ही है, जो राहगीर की तरह भटक रहे है,
उद्देश्य की तलाश में खुदको,
न जाने किन जलती-बुझती लॉ में, झोंक रहे है। 

कभी मंज़िल दिखती है तो, रास्ते खो जाते है,
कभी रास्ते मिले, तो मंज़िल का पता नहीं,
किनारे पर बैठे उस, मांझी की तरह हो गया हूँ,
जिसकी नांव तो है, पर समुद्र ही सूख गया हो। 

इस अथा  सागर के अवशेष में, अब किस तरह डूबकी लगाऊं,
जब पानी की एक बूँद ही नहीं, तो इसमें उतर के कहाँ जाऊं,
हाँ, शायद गेहराई नाप सकता हूँ इसकी मैं,
पर क्या फायदा ऐसे समुद्र का, इसकी गेहराई का,
जिसमे उतरने के बाद भी, इंसान भीगे न। 

ऐसी ऋतू बन गया हूँ, जिसके आने का कोई महीना नहीं,
तिथि तो है, जो कहती है, कभी आऊंगा मैं भी पुर-जोर पर,
पर क्या फायदा ऐसी ऋतू का, उसके आने का,
जब उसका मज़ा लेने, पपीहा ही न हो किसी डाल पर। 

मैं अकेला, जीवन के एक ऐसे मोड़ पर बैठा हूँ,
जिससे आगे जाने का मार्ग, तो मेरे सामने है,
पर उस पर कभी मैं चलूँगा नहीं,
जिसकी मंज़िल, तन्हाई में घिरा एक रास्ता हो। 

Friday, February 15, 2019

Chhalakti Gaagar ...

Hi All,

This is a call from one's heart to someone who is yet unknown and hidden behind veil.


छलकती गागर ... 


चाहत के इस पल को आज फिर हमने गवां दिया,
चला गया जो दिन, वो जीवन से मिटा दिया,
किसी अक्स की चाह में हम आज भी ज़िंदा है,
उमीदों भरी मंज़िल को, रास्ते में भुला दिया। 

जब आगे बढे हम खोजने किसी को,
हाथ लगी जो, सिर्फ परछाई थी,
दिन के उजाले में हमने,
आज उस परछाई को भी गवां दिया। 

समंदर किनारे चलते हुए, जब पीछे देखा,
तो किसी के क़दमों के निशाँ को साथ साथ पाया,
उमीदों की इन लहरों ने आज,
उन निशानों को भी मिटा दिया। 

तेरी तकरार, तेरी मीठी बात,
तेरी हर उस याद को, संजो कर रखा था हमने,
झोंका एक हवा का जो आया,
संजोए मोतियों को बिखरा दिया। 

प्यार के उन पालो का एक महल सा बनाया था,
तेरी मुस्कुराहटो से, आवाज़ों से उसको सजाया था,
कम्पन एक उठी जो दिल में कही,
आज उस महल की दीवारों को भी तुड़वा दिया। 

सवाल है उस ईश्वर से, सब को बनाने वाले से,
इस देह को मेरी बनाकर, एक दिल तो दिया होता,
धरती पे यूँ उतार मुझे अकेला,
क्यों इस दिल का दूसरा भाग, बनाकर मिटा दिया। 

Saturday, August 25, 2018

Search ...

Hi All,

Hope you all are good, its been long time since i wrote my last poem. This is the one with a thought of someone who is yet to be found. So, please enjoy this one and do write your reviews so that i can improve myself further.

तलाश ...

सूखी हुई धरती की रूह में इक कम्पन है,
दीदार हो उसका जिसकी चाहत की तर्पण है। 
यूँ तो प्यार के रस का रसपान सभी करते है, 
पर इसमें विलुप्त हो जाना ही सच्चा समर्पण है। 

जाने कबसे उसकी आस लिए रास्ते पे बैठा हूँ,
कब आएगी वो, जो मिले उससे पूछता हूँ। 
हर किसी का दरवाज़ा खटखटा कर देख लिया,
हर बार निराश हो, आसमान को देखता हूँ। 

उस माँ से एक बार मज़ाक मज़ाक में पुछा,
कि क्या भूल गयी इस दिल का दूसरा भाग बनाना। 
न मैं राधा हूँ, और न ये द्वापर,
जो कृष्णा के अभाव में व्यतीत कर दूँ जीवन अपना। 

है तलाश आज भी उस चेहरे की जिसे देखा है मैंने,
साफ़ तो कुछ याद नहीं, धुंधला सा देखा था सपने में। 
हर रोज़ इसी खख्याल से नींद खुल जाती है कि,
साफ़ होगी तस्वीर उसकी और झलक मिलेगी आँखों में। 

ये बेचैनी सी क्यों है, समझ नहीं पाता मन,
एक दिन मुलाक़ात होगी, कहते है मुझसे सब जन। 
डर एक ही बात का लगा रहता है इस दिल को,
और उसी की तैयारी में जुटा हुआ है,


की कहूंगा क्या उनसे, जब मिलेंगे दर्शन। 

Friday, September 15, 2017

Stranger ...


अजनबी ... 

क्या है इस शब्द का मतलब,
इसका वजूद, इसकी हकीकत,
आइये जानते है,
समझते है इसको,
थोड़ा करीब से,
एक कहानी के ज़रिये। 

एक दिन चौराहे पे, किसी से मुलाक़ात हो गयी,
क्या पता, इस मुलाक़ात में ऐसी क्या बात हो गयी,
कि कुछ पहचाने से लगे वो,
अपने तो नहीं, पर बेगाने भी न लगे वो। 

कुछ दिन बीते, रातें बीती, बात कुछ और हुई,
हंसने लगे दोनों साथ, मेरी खामियाँ भी नज़रअंदाज़ हुई,
फिर कुछ ऐसा हुआ, कि क्या कहे अब,
रातों को जागना, दिन में खो जाना,
ये हाल किसको सुनाये अब। 

एक रास्ता लड़के को सूझा,
उसने फ़ोन उठाया और फटाफट नंबर घुमाया,
सोच रहे हो, कि लड़की को किया फ़ोन,
और बोल दी दिल की सारी बात। 
पर यहीं तो दोस्तों, एक बात समझ नहीं आती,
लड़के को था इतना डर,
कि उसकी जुबां ही उसका साथ छोड़ जाती। 

फ़ोन तो घुमाया था और हाल-ए-दिल भी सुनाया था,
पर की जिससे बात, वो लड़की नहीं थी,
थी उसकी दीदी, 
लड़के की दोस्त, जो उसे करीब से भी जानती । 
सोचा की कुछ मदद मिलेगी, थोड़ी हिम्मत बढ़ेगी,
पर इस बार भी उसकी किस्मत कर गयी धोखा। 
आलम ये है अब, महीने हुए बात किये,
न ही लड़की मिली और हाथ से चली गयी दोस्त। 

वो लड़का अब अनजान, 
खुद से खुदको छुपाता घूमता है। 
हंसना, खिलखिलाना भूल,
बस कहानियों में खुदको ढूंढता है। 

ये थी वो अजनबी जो अपनों से भी अपनी तो हुई,
इतनी की ये लड़का ही अब खुद से अनजाना हो गया। 

अगर समझ आयी कहानी,
तो लड़के के लिए दुआ कीजियेगा। 
और अगर नहीं आयी,
तो पढ़ के बस मुस्कुरा दीजियेगा। 

शुक्रिया। 

Tuesday, August 15, 2017

Partition..

A poem on partition of India


विभाजन ..

आइये एक कहानी है सुनाते,
हिंदुस्तान की कहानी, जिसे आज़ादी है गाती। 

एक परिवार था, मत पूछो कहाँ,
प्यारा सा, बेहेन भाइयो, रिश्ते नातो से भरा,
आँगन में जिनके त्यौहार गूंजा करते थे,
बिना भेद भाव के जहां गले लगा करते थे। 

बिखर गया है आज वो, भीड़ में कही खो गया,
लोग तो आगे बढ़ गए, पर वो खँडहर हो गया। 
किसी ने इस कदर, उसकी आबरू को है नोचा,
की आज भी उसके निशाँ, दीखते है जिस्म पर। 

नफरत भरी आँखों में, इस कदर,
की आज भी परिंदे उसे देख, जाते है सिहर,
जो कभी एक दूसरे की, हिम्मत का हिस्सा थे,
वह भाई अब, नए घरो में करते है बसर। 

नाम नए ले लिए, पीढ़ियां भी बदल गयी,
प्रगति की चादर से, पुरानी इमारत भी ढक गयी,
उस खँडहर में अब, न ही किरणे है बची,
जो थोड़ी उम्मीद थी, आंसुओं में बह गयी। 

लकीर जब खींची थी किसीने, इस परिवार के दो टुकड़े हुए,
सोचा की अगर साथ रहे, तो एक दूसरे को ख़तम करेंगे,
पर आज भी इनमे, वही राक्षस बास्ते है,
कोई पीछे मुड़कर देखे, तो बताये, कैसे रिश्ते सजते है। 

क्या हांसिल किया अलग होकर,
आज तक बैठे है दिलो में आग लेकर,
बस पुरानी यादों के सहारे जी रहे है,
एक दूसरे के प्यार को तरस्कर। 

कई बार दोनों ने कोशिशें की,
पर नयी रफ़्तार में जज़्बात नहीं है बास्ते,
यहां मिलती तकनीकियां, मारने की, 
मिटाने की, एक दूसरे को निचा दिखने को तरसते। 

कोई बताये,
क्या मिला एक दूसरे से लड़कर, मार कर,
जिस मिटटी के टुकड़े के लिए थे लड़े,
उसी की छाती को बार बार लाल कर। 

आज 70 सालो बाद भी, लोग रोते है, बिलखते है,
जब भी याद आता आज़ादी का मंज़र, लोग डरते है,
जिस दिन खुशियां आनी थी, उसने ग़म की चादर ओढ़ी,
वो आज भी हमारे सीनो  में, शूल से चुभते है। 

जिस दिन घरो में दीप जले थे,
वो आधी रात को आयी,
दीपक के उजाले में मिली,
तो बस उसके अन्धकार की गहराई। 

3 युद्ध और आर्थिक रूप की है ये महामारी,
जिससे जूझते दोनों, रोटी को तरसते है,
सडको पे, गलियों में, गाओं में,
बच्चे दूध को बिलखते है। 

वह मिटटी, जिसकी आबरू के लिए दी कई कुरबानियां,
उसकी छाती अब सूख रही है, ये है हमारी मेहरबानियां,
जो कभी सोना उगला करती थी, दुनिया को रोशन कर,
अब उसके अपने घर पर, गुमसुम है किलकारियाँ। 

विभाजन करने वाले चले गए,
पर उसके ग़म से जुझती नस्लें,
मरहम की उम्मीद में ज़िंदा है,
सूखी छाती और घाव लिए बदन पे। 

" वह माँ आज भी चौराहे पे,
   उम्मीद लगाए देख रही है। 
   कब दोनों बच्चे लौटेंगे,
   और कब ये खँडहर नाचेगा। 
   कब कड़वी यादों पे,
   मरहम वो लगाएगा। 
   कब फिर से इस आँगन में,
   ईद मानेगी, दीप वो जलाएगा।

   क्या ऐसा भी एक दिन आएगा,
   कब ऐसा भी एक दिन आएगा। "

Saturday, February 18, 2017

You ...

This one is something special for me...


You ...

It was raining like hell, when I saw you for first time,
It wasn't the usual rain, rather was rain of your smile,
I wasn't able to imagine, what it was actually,
I was sweating profusely in the middle of windy night.

It was my eyes that kept searching for you,
It was my ears that kept looking for you,
Why I always wanted to be around, I don't know,
But the feeling that I got, I knew it was you.

They say that love has no shape, then why it looks like you,
They say that love has no voice, then why it heard like you,
I was alone, suffering and evaporating slowly in my world,
Then why now I want to get condensed with you.

I never thought, I will be writing this,
I never thought, I will feel like this,
I know, you will never be mine,
Then why still, it feels content with you.

I know, I would never say this to you,
I know, I would never let you know,
I fear of the neglect that I might receive,
Then why it still says to be with you
and let you know.

Sunday, February 12, 2017

Mohabbat ..

I am posting this now as i thought that it is worth to be posting.. These are my feelings and my expressions in a mix of two beautiful languages.. Hindi and Urdu..

Kindly read and give your feedback..


मोहब्बत ... 

जशन-ए-मोहब्बत को दिल में बसाया,
नफरत-ए-आंधी को लबो पे भी लाया,
ऐ मुक़द्दर के मालिक, 
तेरी मुल्कियत खिदमत में खुद को सजदा कर 
खुद को आशिक़ो के जनाज़े का हिस्सा बनाया। 

जशन-ए-मोहब्बत की रूह को छूकर,
तेरे पास होने के ऐहसास को खोकर,
ऐ मुक़द्दर के मौला,
तुझे अपनी ज़िन्दगी के कारवाँ का बादशाह समझकर
उसको बेवफा समझा और खुद को काफ़िर बनाया। 

जशन-ए-मोहब्बत में रियायत बरती,
तुझे दूसरे के आशियानें में देख ये जां निकलती,
ऐ मुक़द्दर के शहंशाह,
बस इतना बता दे क्या कसूर था मेरा
क्यों इस दिल को आईना और उसे पत्थर का बनाया। 

जशन-ए-मोहब्बत की आज़ादी का नशा है,
अकेलेपन में डूबने की मिली इस दिल को सजा है,
ऐ मुक़द्दर के मसीहा,
बस इतना बता दे क्या पाया इस नन्ही सी जान को सताकर,
क्यों रास्ता दिखा कर हर बार मुझे भटकाया। 

Tuesday, August 16, 2016

Two India...

Hi All, This is my new poem based on the concept of Two India. We all know that India is a secular country. It has many cultures, languages and religions. But, it also has a differentiation based on the people's mentality. There are two India that resides in my country. This poem is a satire on the same concept.



"मेहफिल  ... "

कई है बन्दे जो यहाँ, रहते जो बस घर-घर में है,
देखते है इक नज़र से, सोचते दो मन से है,
गिरगिटों सी है ये फितरत, दीखते जो एक रंग में है,
क्या बताये आज तुमको, बात जो मेहफिल में है।

कई है बन्दे जो यहाँ, कहते है जो करते है वो,
जेबे है इनकी ही खाली, दीखते है आदर्श वो,
सब जगह इनकी ज़रुरत, इनकी न सोचे कोई,
क्या बताये आज तुमको, बात इस मेहफिल में है।

ये थी इक गाथा सुनते, भारत के स्वरूपों की,
भिन्न है जो प्रारम्भ से और आज के आरम्भ में भी,
साथ मिलके वो मनाते है दिवाली ईद भी,
क्या बताये आज तुमको, बात जो घर-घर में है।

पाने को स्वतंत्रता, दी है कई कुर्बानियाँ,
मानते है सब यहाँ, इनकी है ये मेहरबानियाँ,
सींचा है भारत को हमने, सबकी इन उम्मीदों से,
सिखलाती हमको कहानी, आज़ादी के महत्व से।


Wednesday, February 17, 2016

A New Face...

This is the one dedicated to one who came as a flash to me...


चेहरा। ... 

जी करता है दिल की हसरत तुझे बना लूँ
हर एक लम्हे की चाहत तुझे बना लूँ
कह कुछ पाता नहीं यूँ तो तुझसे मैं
पर दिल में अपनी मोह्हबत तुझे बना लूँ।

तुझसे बात करने को जैसे ये दिल तड़प गया था
हर लम्हा देखने को जिसे नज़रे तरस गयी थी
क्या कुछ नहीं किया उनकी एक झलक पाने को
इंतज़ार तेरी आँखों का मेरे दिल में उतर गया था।

किस मूरत से बनाया है उपरवाले ने तुझे
जहाँ देखता हूँ बस देखता हूँ तुझे
ये नशा है किसी चीज़ का या कुछ और
कहाँ एक याद थी नज़रों की तू
और अब कुछ कहने की चाहत है तुझे।

Friday, December 11, 2015

Dawn... The Morning

This one is after quite a long time. I was just lost in the middle of some maze but, thanks to God, I am rescued hail and hearty.

I hope you will like my new poem.....

सवेरा ... 

फिर आज कई दिनों बाद नींद से जागा हूँ ,
फिर खुली है आँख, उठ बिस्तर से भागा हूँ ,
ये नई सुबह का एहसास है या पुरानी यादों की रौशनी ,
फिर अरमानो के झरोखे से बाहर झाका हूँ।

बनाते बनाते ये कभी एहसास ही नहीं हुआ ,
सपनो के महल में कही दूर खो गया ,
आज जागा तो पता चला सच्चाई का ,
फिर इस बार किले को धरती पे बनाना भूल गया।

तक़्दीर बनाने वाले ने भी खूब बनाया है ,
रेत के किलो सी तक़्दीर सबकी बनायीं ,
कभी बनती तो कभी लहरों में मिल जाती है ,
फिर इसी महल को लहरों से दूर बनाना भूल गया।

फिर आज कई दिनों बाद नींद से जागा हूँ ,
सुबह की ठंडी में बाहर निकला ,
सूरज की गर्मी को साँसों में भरे ,
फिर अरमानो के किले बनाने मैं चला।


Wednesday, January 14, 2015

Someone...

This poetry is about someone and is also for someone. Someone, who is very important to me but is still not with me. Someone, whom i have not met in months or years probably but still i meet her everyday.
I just wish everyday that i do not meet that someone ever but, still there is a void in my heart that craves for someone.


कोई …

कल के बिखरे मोतियों को समेटने मैं जब चला
किसी की बातों के असर का मुझे थोड़ा पता चला
था कितना बेवक़ूफ़ मैं पहले और आज भी हूँ
चल दिया था बिन सोचे कुछ और आज भी वही कर रहा ।

पहली बार जब देखा था उसको, जाना था कुछ एहसास है वो
पास गया देखा कुछ देर बात कर, तो लगा कुछ ख़ास है वो
प्यार से वो जब एक बार मुस्कुराती तो सूरज की किरणे भी छुप जाती
शीश के परदे से जब नज़रे उठाती, तो जाना मेरे दिल के पास है वो ।

बातें हुई, मिलने लगा, बस किसी न किसी बहाने उसके पास जो जाना था
डूबने का तो बहाना था, अजी अपने दिल को जो डूबने से बचाना था
मेरे दिल के एहसास ने कई बार चाहा, उससे कहू, उसको बता तो दूँ
पर हर बार सोचता कि उससे हाँ कराने का वो कौन सा बहाना था ।

फिर एक दिन आया, सब चल दिए अपनी अपनी राह
लेकर वो बात अपने दिल में, न कर सका जो लफ़्ज़ों में बयाँ
थक कर समझौता किया मैंने खुद से और सोचा की हंसी ख्वाब था कोई
देखते है ऊपर वाले ने किसे लिखा जिसपे हो जाऊंगा फना ।

समय ने फिर कुछ ऐसा चलाया चक्कर
घूम कर आया वही जहाँ था उसका घर
फिर हुई मुलाक़ात, कुछ बात, हमारे बीच
पर इस बार हुई पहले से भी बड़ी गड़बड़ ।

अब क्या कहु, थक गया हूँ मैं उस लीलाधर की मुरली से
कुछ करो प्रभु, मिला दो उसे मुझसे कही से
यही प्रार्थना हर बार करता हूँ मन में
पर ऊपर से मुस्कराहट लिए, उसका नाम भी नहीं लेता मुख से ।

Thursday, January 1, 2015

Pain..

Pain is the actual face of life. Pain is the one that makes us realize who we actually are. Pain helps us to remember God and loved ones. Pain is the one that defines the measurement of happiness. Pain is always their with us whether we want them or not.


 दर्द …

दर्द-ऐ-दिल का आलम क्या है, अब मैं क्या बताऊँ 
दर्द-ऐ-रूह का आलम क्या है, अब मैं क्या समझाऊँ 
यूँ तो हमने भी कोशिश बहूत की उनको भुलाने की
दर्द-ऐ-यादों में उनको बसा कर, अब मैं कहाँ जाऊँ। 

दर्द-ऐ-पल में क्या होता है, ये शायद कोई न समझे
दर्द-ऐ-राहों पे अकेले चलना, ये कभी किसी को न पड़े 
यूँ तो हम लड़ सकते हज़ारों से है, पूरे जहाँ से है 
दर्द-ऐ-दर्द से लड़ने की ज़रुरत, कभी किसी को न आये। 

दर्द-ऐ-वक़्त पे जो हज़ारों ज़ख्म है, उनको कैसे बर्दाश करू 
दर्द-ऐ-आँखोँ की जो फ़रमाईश है, उनको कैसे पूरा करू 
यूँ तो जीया करते थे हम भी ज़िन्दगी को जी भर 
दर्द-ऐ-साए में जो चेहरा है, उसको कैसे ज़िंदा करू। 
 

Destiny...

Destiny is something that weaves its web with time. Nobody knows what it has hidden in its basket for whom. It is always a gift that surprises people and their surroundings when the gift gets unwrapped. There is a saying that whatever decisions we take is not ours, but is just a way that is provided by destiny to lead us to our fate.


नियती …

ज़िन्दगी कितना कुछ दिखती है
अधूरे पलो को अकेला है
यूँ तो हम सब सदा ही अपनों के करीब होते है
पर फिर भी तन्हाई बेबस छोड़ जाती है। 

जिन नन्हे कदमो ने पग धरा था धरा पर
एक दिन वो चल पड़ते है कर्म धरा पर
सारे बंधन टूटते है, छूट जाते है 
पर जीवन की लौं नहीं बुझती इस धरा पर। 

आगे चलते हुए जब बड़े होते है शक्श यूँ
दर्पण से भी शर्माती है अक्स क्यों 
आँखों के सामने बीता पूरा जीवन है 
फिर भी भविष्य की समझ से कहते बक्श क्यों। 

हाथों में हाथ मिलता फिर जीवन साथी का 
लौह पद भी बन जाते फूल राही का 
ये कैसी विडम्बना है नियती कि 
श्री कृष्ण को भी तजना पड़ा था
आँगन यशोदा माई का। 

Sunday, September 7, 2014

Hope...

Hope is the only thing  that inspires us to live. We live just because we hope that we will get what we desire some day. Actually, we are always surrounded by hope. Every moment of our life is just dependent on hope and is because of hope.

We Study because we hope to get good marks in exams. We hope to fulfil the desires of our parents and hope to be the best son. We hope to be the best role model of our class. We hope to be the best in our friend circle.

We work because we hope to satisfy the needs of our family. We hope to grow with the time and reach to the highest point. We hope to give all the comforts to our family, our children, that money can buy.

Every smaller or bigger events in our life occurs just because we keep hope to make it happen. Hope is the only thing that nourishes a small seed to a bigger tree one day.

आशा … 


आशाओं के पर्दे पर कई ख्वाब जड़े है,
ज़िन्दगी की धूप से पर फिके पड़े है। 
कई बार लगता है क्या होगा इन ख़्वाबों का,
कभी पूरे भी होंगे जो अधुरे खड़े है। 

आशा जिसपे पूरा जहान चलता है,
आशा जिसमें इंसान सपने बुनता है। 
अपने आने वाले कल में रंग भर कर,
कितनी आसानी आशा के जाल में फंसता है। 

सब कसूर इस दिल का है
हर छोटी सी बात से आशा रख लेता है,
सोचता है लोग उसकी आशा को महत्व देते है। 
पर हर बार भूल जाता है,
कि लोगो से जो मिली तो सिर्फ सांत्वना है। 

कैसे समझाऊं कि खुद पर क्या बीतती है,
हर रोज़ जब सबको घर से निकलते देखता हूँ,
मैं खुद नई आशा के साथ निकलता हूँ,
पर रात तक मेरे मरने के साथ फिर,
वो आशा सिर्फ एक अफ़सोस बनकर रह  है। 

किस तरह समझाऊं कि क्या सोचता हूँ मैं,
भूल जाता हूँ कि इंसानो का एक दाएरा  होता है,
हम सब में एक बहुत अच्छा गुड़ है,
हम अपने आगे किसी को समझ ही नहीं पाते,
और इसी समझ और बात के बीच में खो चुका हूँ मैं। 

अब बस अपनी हिम्मत को बटोरे सिसक रहा हूँ मैं,
अपने अंदर की आग में जला हुआ,
खुद से कही न कही खफा हुआ,
कि ऐसी क्या गलती थी मेरी जो मेरे साथ ही ऐसा हुआ,
आँखों में भरे उजालो को बंद कर रहा हूँ मैं। 

बस बिना किसी लक्ष्य के आशाओं को पैदा किया,
और उन आशाओं के भार तले मैं सो रहा। 

Friday, August 15, 2014

Happy Independence Day.....

Independent India is a part of United India. United India, a vision of many philosopher and most people of India, Pakistan and Bangladesh. Every coin has two sides and just like that there will be pros and cons of United India. Now, You think and decide, how do you want to see the future India?

स्वतंत्रता दिवस …

 कैसी ये कहानी है, लगती थोड़ी बेगानी है,
एक मुल्क के तीन हिस्से कर गए सियासतदानों ने। 
वो देश जो कभी खुशहाल था, उसे छोड़ गए तक़रारो में,
इस देश के सियासतदानों ने। 

जहाँ कभी थी सड़के पड़ी, उस जमीन का रंग भी लाल है,
आज़ाद होकर भी लोग, रहते यहाँ बेहाल है। 

कैसे भूल पाओगे आज़ादी  शहीदो को,
जो कूद पड़े थे जंग में आन की रक्षा करने को। 
लाखों शहीद हुए, बर्बाद हुए, देश की आन बचाने को,
बदले इसके हमने दिए, कई और लड़ाईयां लड़ने को। 

इस अनंत दुश्मनी के कारण, कई यहाँ बेकार हुए,
अपनी जान बचाने को, अपने घर, देश से बाहर हुए। 
कैसे मिटा पाओगे खून के उन धब्बो को,
जो हमने इस धरती पे लगाये, अलग मुल्क पाने को। 

कैसे भूल पाओगे, ईतिहास के उन पन्नो को,
जो याद दिला देती है, देश के सुनहरे क्षणों को। 
इसी सुनहरी धरती पे, जहाँ सब मिलकर रहते थे,
त्यौहार साथ मनाते और दुःख को मिलकर सहते थे।

तकदीर ने कैसा ये खेल किया,
सारे जहाँ में इनको दुश्मनी का भेट दिया।
ऐसी इनकी कहानी है, जो लगती थोड़ी अंजानी है,
तीन हिस्से हो गए इस देश के सियासतदानों से।

Sunday, July 27, 2014

End or start ?...

This is my new piece that I have written after almost 2 and a half months. This time there is no introduction. Rather, I would like to ask my readers about their understanding, their opinion regarding this poem and also my writing (of-course).


अंजाम और आघाज़  … 


यादों के दरवाज़े पे, आज फिर किसी की दस्तक है,
आँखों के अधरों पे, आज फिर किसी की हरकत है,
सोचता क्या है साथी, उठ चल, जाकर देख तो ज़रा,
क्यों मेरी कब्र पे, आज रखा किसी ने मस्तक है। 

आनेवाले कह जाते है, आज फिर हमे याद आये हो,
घर में थी आज दिवाली, पर वो कोना संग लाये हो,
जहा बैठकर बातें करते थे, तुमसे हम दिन रात,
अब बस उस कोने में, आँखें नम कर आये हो। 

कैसे बतलाऊं उनको मैं, बिन उनके मुझे चैन नहीं,
हर पल बस सोचता हूँ, आराम मुझे दिन रैन नहीं,
कैसा होगा वहाँ का मंज़र, जिसका कभी मैं हिस्सा था,
जिसके साथ जीया जीवन भर, नए घर उन बिन चैन नहीं। 

सोचता हूँ उठ जाऊं, उन तक, पूछू तो सब कैसा है,
मुझ बिन तो संसार वही है, वही यहाँ का पैसा है,
अब समझ पाया हूँ, कि सब यहाँ एक पथिक है,
ये यूँही चलता रहेगा, जीवन ही कुछ ऐसा है। 

कितने आये, कितने गए, पर मैं वही पर बैठा रहा,
छोड़ आये थे मुझको जहा, वही चुप दफना रहा,
सब साथी यहाँ मुझसे कहते, अब छोड़ दे माया संसार की,
हाँ ज़ुबान से कर मैं, मन में चिंता करता रहा। 

ये कैसी जग की माया है, न भूख लगे न प्यास,
आँखें एक पल झपकी नहीं, फिर भी नींद नहीं है रास,
जग से तो चले गए, मिट गयी हमारी यादें,
न मिटी जो रह गयी, वो ईन आँखों की आस। 

सोचु यहाँ कि क्या मिला, जी कर सबके साथ,
पढ़ा लिखा सब कुछ किया, की हर सच्ची बात,
आँखों पे पड़ा पर्दा जग के, कैसे इसे उतारू,
लेटा हुआ इस कब्र में, रखे हाथ पर हाथ। 

जी रहे जो क्यों न देखे, जो मुर्दे को दिख जाता है,
माया का पर्दा पड़ा, सो बुद्धि नहीं पाता है,
इसलिए शायद डरता जग, मुर्दे से जब भी मिले,
दर्पण में देख चेहरा अपना, संसार घबरा जाता है। 

कैसे सबको मैं समझूँ, हम सब डरते रहते है,
इंसानो के आतंक से, चुप चाप यहाँ पर सहमे है,
इससे तो अच्छा होता, कि बीटा तू मुझे जला देता,
यूँ इस तरह न रहना पड़ता, जहा नाले बहते है। 

मरने की जो सच्चाई है, उसपे कैसे मैं विश्वास करू,
कल तक जिस देह ने मेरा साथ दिया, उसका कैसे मैं त्याग करू,
इस जीवन की सच्चाई पे, बैठा मैं यूँही सोच रहा,
खुद को आँखों के सामने देख, कैसे मैं विश्वास करू। 

मरने से पहले मैं था इसमें, ये मेरा आघाज़ था,
इससे ही बनाया ये जहाँ, जिसपे मैंने किया राज था,
सोच रहा इस मोड़ पर, कैसे आघाज़ को अंजाम करू,
सब मुझको सुने, मैं सबको सुनु, क्या कभी कोई ऐसा साज़ था। 

अब इस देह में जाकर देखू, किया क्या इसका मैंने,
जब ज़िंदा था तो उलझा रहा, भरोसा  न किया इसका मैंने,
ये चीख-चीख कहता रहा, माया से बाहर आजा,
मर गया अगर तो खो जायेगा, पर अनसुना किया मैंने। 

ये गाथा है आघाज़ की, अंजाम सुनाती जो हमको,
शुरुआत से जो मिला, उसकी कदर बताती है हमको,
कब्र में जाने के बाद, ये देह न फिर पायेगा,
सारे काम खत्म कर लो, नहीं तो चिंता संग रह जायेगा। 

Sunday, May 11, 2014

Mother's Day...

Mother is not only a word but an emotion that is present in everyone's life but still experienced by most of us. Dedicating the whole life to a woman, who raises us from a nobody to somebody, is still lesser than the love she gives. The world has grown so busy that we have started lacking this feeling but still there is a hope and that is prepared by celebrating this day.

My small dedication to incarnation of "THE ULTIMATE" on this earth.


माँ.… 


माँ हर वक़्त हमे याद आती है,
या यूँ कह लो, दूर होकर भी पास रह जाती है ।
चाहे वो सुबह की चाय हो या शाम क नाश्ता,
उसके हाथों का बना खाना हि भुख मिटाती है ।

हर रोज़ सुबह उठ कर सबसे पहले तुझे सोचता हूँ,
तू अगर पास होती तो प्यार से उठ्ता हुँ ।
रात को डर लगे तो तुझको ही पुकारू,
प्यास लगने पर पानी किस्से मांगू ।

माँ तू जो नहीं पास मेरे,
तो सब अधुरा लगता है ।
रहता हूँ बड़े शेहर में,
पर अपना घर ही प्यारा लगता है ।

ऊँची ऊँची इमारते है यहाँ कहने को,
पर सुकून नहि कही रह्ने को ।
नींद तो तब ही आती है आँखोँ में,
जब लोरी तेरी गुनगुनाती है कानोँ में ।

कैसे तुझको समझाऊं अपनी बातेँ,
किस तरह बताऊँ कैसे कटती है रातें ।
मन में हर वक़्त एक ही सवाल है,
क्यों नहीं कह सकता मन की सारी बातेँ ।

क्यों लोग अपनी माँ को वृद्धाश्रम मैं छोङ जाते है,
क्यों वो ये नहीं समझ पाते है कि ये ठीक नहीं ।
जिसके कारण तुम आज हो इस दुनीया में,
उसको क्यों उसकी विवशता पर रोने छोड़ जाते  है ।

" चीज़ो की वास्तविकता तब समझ आति है,
जब वो समय बीता हुआ कल बन जाती है । 
माँ ही एक ऐसी है जिसकी आँखों से,
ये पूरी दुनिया भी हसीन नज़र आती है । "

Saturday, May 3, 2014

Truth of Life...Hatred or Love...

The naked truth of our LIFE is that we always give importance to materialistic things than to spiritualistic things. We often go for prayer, but rather concentrating on prayer, we are more concern about our donations. 

We often say to our loved ones, "Don't Worry !!! If you ever need anything, you can always ask me. Always consider, I am there for You. Never feel alone in life." Now the magic happens, when the MONEY matters come. All that concern goes to hell. We even start fighting with their loved ones. We now start recalling all the favours we do. We even hate our  brothers, sisters, relatives so much that we even can't bear a moment of their look. 

I would like to plead all my readers that please, try to make this world a better place to live. If you can't live upto your promises then please, don't promise. 
What more could I say. You all are very much wise so, please take your own decisions by using your own wisdom.

Truth of Life...Hatred or Love...


अकेले आना है, अकेले जाना है,
बाकी समय इस दुनिया का साथ निभाना है,
रिश्ते-नातो से बन्धा ये संसार है,
धागो को बस किसी तरह टूटने से बचाना है ।

क्या हो जाता है हमारे अन्दर के मेन को,
क्यों हम अपनों से बैर रख्ते जीवन को,
ऐसा क्यों होता है कि बहार के लोग अपने हो जाते है,
क्या पैसे से हि लोग भाते है मन को ।

हर तरफ़ देखो बस नफरत हि नफरत है,
कोई पैसे से जलता है तो कही ईर्ष्या कि लत है,
क्या करेंगे हम इतनी ईर्ष्या कर्के सबसे,
आखिर किसी को तो मुह दिखाना जब अन्त है ।  

क्यों भूल  जाते है लोग कि पैसा कभी काम नहीं आतां,
क्यों भूल जाते है लोग कि ईर्ष्या से मन चैन नही पाता,
रहना है इस दुनिया में सबको किसी तरह,
तो क्यों इसमें कोइ प्यार नहि लाता । 

Thursday, April 24, 2014

Selfishness...

Selfishness of Self-Centeredness is like an insect that makes a person hollow from inside by eating all the reasoning powers slowly. Thus, we must try to protect ourselves from this insect by using our reasoning abilities efficiently.

Thus, a small dedication to this natural but non-shrinking feeling.

स्वार्थ … 

ऐसा हृदय नहीं देखा, जिसे समझाए समझ न पाए,
कैसी माया स्वार्थ की, देख कर न देख पाए,
सत्संग की संगती भी, कुछ न असर दिखाए,
ऐसी वाणी फिर भी निकले, जो आप आप ही गाये ।

ज़िन्दगी की ये विडम्बना, कैसे किसे समझाऊं, 
लोक माया छोड़ कर, सब को एक ही चीज़ बताऊँ,
सब कुछ पीछे छुट जायेगा, दुनिया की टोकरी में, 
राही अकेला चल चलेगा, ये कैसे सबको दिखाऊं ।

मंदिर बना, मस्जिद बना, पर शांति कही न पाऊं, 
दर दर खोजा आपको, पर माटी ही लाऊं,  
एक बात बतलाई सभी ने, कि मैं उनको न पाऊं,   
कुछ ऐसा इस पार करू, कि उनको मैं पा जाऊं ।